बिहार के मधेपुरा स्थित मधेपुरा इलेक्ट्रिक लोकोमोटिव प्राइवेट लिमिटेड (एमईएलपीएल) कारखाने ने अब तक भारतीय रेल को 12,000 हॉर्स पावर क्षमता वाले 650 इंजन बनाकर सौंप दिए हैं। 75 एकड़ में फैले इस परिसर में हर साल लगभग 100 हाई-पावर लोकोमोटिव तैयार किए जाते हैं। भारतीय रेल की पटरियों के ठीक बगल में स्थापित इस कारखाने का संचालन रेलवे और बहुराष्ट्रीय कंपनी एलस्टॉम की संयुक्त साझेदारी में हो रहा है, जहां एशिया के सबसे शक्तिशाली रेल इंजनों का निर्माण किया जा रहा है。
कारखाने के प्रबंध निदेशक अशोक कुमार सिंह के अनुसार यह 12,000 हॉर्स पावर का इंजन दो अलग-अलग सेक्शनों को जोड़कर बनाया जाता है, क्योंकि 12,000 हॉर्स पावर उत्पन्न करने के लिए एक अकेला सेक्शन पर्याप्त नहीं था। 6,000-6,000 हॉर्स पावर के दो सेक्शन कपल होकर एक पूरा इंजन बनाते हैं, जो 6,000 टन तक की भारी मालगाड़ी को खींचने में सक्षम है। इसके नीले रंग, भारी वजन और बेधड़क परिचालन के कारण इसे 'नीला हाथी' नाम दिया गया है। सामान्य सिंगल ट्रेनों के लिए कैटेनरी तार की ऊंचाई 4.5 मीटर होती है, जबकि डबल-डेकर कंटेनर ट्रेनों को खींचने के लिए एलस्टॉम की तकनीक से 7 मीटर ऊंची कैटेनरी को छूने वाला विशेष पेंटोग्राफ लगाया गया है。
मूल रूप से मालगाड़ियों के लिए डिजाइन किए गए इस लोकोमोटिव को अब यात्री ट्रेनों में भी उपयोग में लाया जा रहा है। प्रबंध निदेशक ने बताया कि छठ पूजा के दौरान भारतीय रेल में इंजनों की कमी होने पर रेलवे के अनुरोध पर रातोंरात आवश्यक इलेक्ट्रिकल और इलेक्ट्रॉनिक बदलाव किए गए थे। इसके बाद यह इंजन यात्री सेवा के लिए उपलब्ध कराया गया। वर्तमान में यह इंजन मधेपुरा से पटना के बीच चलने वाली राज रानी एक्सप्रेस ट्रेन को नियमित रूप से खींच रहा है。
कारखाने में एक पूरा इंजन दो से ढाई दिन में तैयार हो जाता है। इसके लिए दो अलग-अलग असेंबली वे बनाए गए हैं, जहां सेक्शन ए और सेक्शन बी का निर्माण एक साथ समानांतर चलता है। उत्पादन के पहले चरण में निचले फ्रेम की वायरिंग की जाती है। इसके बाद बाहरी फ्रेम असेंबल होता है और निचले कंपोनेंट लगाए जाते हैं। फिर खुले छत वाले ढांचे के भीतर आंतरिक उपकरण फिट किए जाते हैं। डबल डेक रैक और ओवरहेड क्रेन की मदद से छत और ऊपरी उपकरण लगाए जाते हैं। इसके बाद पूरी तरह वातानुकूलित, आधुनिक कंट्रोल कमांड सेंटर वाला लोको पायलट केबिन, मोटर और अग्निशामक सायरन जोड़े जाते हैं। अंतिम चरण में क्रेन की सहायता से व्हील और एक्सेल असेंबल किए जाते हैं。
संयंत्र का निर्माण आधुनिक औद्योगिक मानकों पर किया गया है। क्रेन संचालन के लिए भवन की ऊंचाई काफी अधिक रखी गई है। छत पर 100 मिलीमीटर का इंसुलेशन लगाया गया है ताकि बाहर की गर्मी अंदर न पहुंचे। दिन में कृत्रिम रोशनी की जरूरत कम करने के लिए पारदर्शी छत की शीट लगाई गई हैं। क्रेन के ऊपरी हिस्से में हाई वॉल्यूम लो स्पीड (एचवीएलएस) पंखे लगाए गए हैं जो बड़े पैमाने पर हवा नीचे फेंकते हैं। संयंत्र में सुरक्षा के सख्त प्रोटोकॉल लागू हैं, जिनमें ग्रीन लेन पर चलना, सुरक्षा जैकेट, हेलमेट, जूते और हार्नेस का उपयोग अनिवार्य है। कारखाने को कई सुरक्षा पुरस्कार भी मिले हैं。
संयंत्र परिसर के भीतर बने समर्पित टेस्ट ट्रैक पर प्रत्येक निर्मित इंजन का डायनेमिक ट्रायल टेस्ट किया जाता है। सभी परीक्षणों में खरा उतरने के बाद ही इंजन भारतीय रेल को सौंपा जाता है। वीडियो के मुताबिक पटना के निकट महौली हॉल्ट की रहने वाली कृति, जो एलस्टॉम की पहली महिला लोको ड्राइवर हैं, इन इंजनों का अंतिम डायनेमिक टेस्ट ड्राइव करती हैं। कारखाने में एनआईटी पटना से शिक्षित रोनिका बोगी मोटर असेंबली और गुणवत्ता जांच संभालती हैं, अंकिता कुमारी उत्पादन कार्य देखती हैं, दीक्षा द्विवेदी और हर्षप्रीत कौर ईपीयू मैनेजर के रूप में सुरक्षा, गुणवत्ता और लाइन प्रबंधन देखती हैं, रूबी जोशी फिटिंग कार्य संभालती हैं, और मधेपुरा की स्थानीय निवासी प्रीति पिछले सात वर्षों से यहां कार्यरत हैं।


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